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मेरी दुआओं को असर

मेरी दुआओं को असर नहीं मिलता  खुदके लिए ही अक्सर नहीं मिलता   मेरे लिखने को जिगर नहीं मिलता उस रोज वहाँ तू अगर नहीं मिलता   मैंने ढूंढे हैं बहुत समझने वाले यहाँ इन गीतों को समझे पर नहीं मिलता जो दिल में उतरे आखिरी मोड़ तक  यहाँ वहाँ अब वो नजर नहीं मिलता   इश्क बिकता है बाजार में सुना था मैंने खोजा लेकिन इधर नहीं मिलता कई रूह भी नीलाम सरेआम हो गयी मैं भी लेता पर तू उधर नहीं मिलता   

गुफ्तगू

 वो जब तुम बात करने लगती होना मुझसे     तो खिल उठता है मेरा ये मायूस चेहरा           और ये दिल दौड़ने लगता है               कल्पनाओं के घोड़ों पर              नदी पहाड़ जंगल झरने    फिर तुम जब चली जाती हो यूंही बेरुखी से तो सो जाता है दिल यथार्थ के उदास बिस्तर पर

एक पगली याद बहुत ही आती है

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जब यारों की महफ़िल में अचानक छिड़े चर्चा मोहब्बत बाली, या फिर नुक्कड़ बस्ती दूर गली में कोई दिखती है भोली भाली, करूँ जतन पर,दिल पर मेरे छुरियाँ सी चल जाती हैं सच कहता हूँ,एक पगली मुझको याद बहुत ही आती है एक नाम जो,तीरथ था मेरा एक गली जो,काशी मथुरा थी अब कहाँ रहे वो मंजर सारे हर ख़्वाहिश भी,कतरा-कतरा थी भूले भटके कभी कहीं से उसकी तस्वीर अगर मिल जाती है सच कहता हूँ,एक पगली मुझको याद बहुत ही आती है प्रेम प्रसंग पर,कोई फ़िल्म हो या मम्मी दीदी वाले नाटक वधु चरित्र वाली हर लड़की खोले अतीत वाले फाटक तब हृदय वेदना,और अश्क़ों को झूठी,मुस्कान मेरी छल जाती है सच कहता हूँ,एक पगली मुझको याद बहुत ही आती है पाया था,मैंने भी उसको मन्नतों के लंबे,समर लड़कर हर आहट पर,सजदा था मेरा थामा था उसको,गिर पड़कर अब मैं नहीं!तो फिर कौन? किसको?मेरा हल बनाती है? सच कहता हूँ,एक पगली मुझको याद बहुत ही आती है जज्बातों को जरा सजा दूँ गज़ल कोई बन जाती है सब कहते हैं मैं लिखता हूँ पर अर्थ तो वो ही लाती है नींद सुकून उम्मीदें स्वाहा गर फ़िक्र तेरी पल जाती है सच कहता हूँ,तू पगली मुझको या...

अपने उस गाँव में

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पीपल की छाँव में अपने उस गाँव में सकरी और उजड़ी पर दिलकश उन राहों में टूटे से घर में जलती दोपहर में छिपते छिपाते दिल के शहर में क्या अब भी कोई सुबह शाम से मिलती है राधा कोई क्या घनश्याम से मिलती है जमुना के कोई मुहाने की दस्तक होती है दिल के किबाड़ों पे अब तक इठलाते मौसम और मोहब्बत के किस्से कब तक अकेले सिलूँ मैं वो हिस्से तुम भी लिखो और मुझको बता दो जेठ की आंधी अब भी क्या तूफ़ान से मिलती है बड़े जतन कर सबरी क्या श्री राम से मिलती है वो मिलजुल के रहना सराफत का गहना हर एक आपदा को सदा साथ सहना वो ईद और दीवाली जो संग संग मनायीं यहाँ खीर पूरी वहाँ सेवइयां थी खायीं यहाँ मुझको वैसा न दिखता समर्पण टूटा हुआ सा अब मेरा है दर्पण वहाँ क्या अब भी गीता कभी कुरान से मिलती है सभी बंधन भूल आरती क्या अजान से मिलती है

तुझे जो पालिया हमने(मुक्तक-a sad heart)

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तुझे जो पालिया हमने तमन्ना कुछ नहीं हमको तुझे जो खोदिया हमने गिला भी कुछ नहीं हमको जो पाया था वो खोया है इसमें अफ़सोस कैसा है मगर दिल से मेरे पूछो सिला ये क्यूँ मिला हमको. मैं तेरा हूँ तू मेरी है फिर क्यूँ इनकार करती है खुदी में चूर है इतना खुदी पर बार करती है मैं प्यासा हूँ समुन्दर होकर भी इक बूँद का यारो तू समां ऐ इश्क मैं परवाने को क्यूँ बर्बाद करती है. जो मेरी आँखों का पानी है मोहब्बत की निशानी है जो तू छूले तो सागर है जो छलका दूँ कहानी है मोहब्बत का हर एक पल मेरे दिल में बसा अब तक इश्क माना गमजदा है मगर फिर भी रूमानी है. जमाने भर की खुशियाँ फिर तेरे क़दमों में लाया हूँ तेरे दिल में बसा है जो वही फिर दौर लाया हूँ मैं तुझसे पूछता हूँ ये बता मेरी खता क्या थी मैं मिटकर भी तेरी खातिर संबर कर आज आया हूँ.

गम-ए-मोहब्बत(pages of love)

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लिखा है गम मोहब्बत पर मिला भी कुछ नहीं हमको सभी पढ़कर बढे आगे गिला भी कुछ नहीं हमको मेरी तकदीर में ही हर तरफ एक बस वीरानी है मिली ठोकर ज़माने से खला भी कुछ नहीं हमको .

कोई कल कह रहा था(मुक्तक)

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कोई कल कह रहा था तुम मेरी ही बात करते हो ज़माना बीत गया किस्सों को फिर भी याद करते हो जो तुम्हारे सामने था वो तुमने देखा नहीं तब तो अब तन्हाई में रो रो कर खुद को बर्बाद करते हो. जो ये पैगाम मैंने पालिया तुमसे मैं कहता हूँ चले आओ मेरे ही पास ये उम्मीद करता हूँ मैं सबकुछ भूल जाऊंगा मोहब्बत में तलक अब भी तेरे आँसू की कीमत आज भी बस मैं समझता हूँ. तेरे खोने में जो खोना है वो मेरा ही खोना है तुम्हारे साथ जो गुजरेगा वो मेरा भी होना है जुड़ी हैं इस तरह साँसे लिपट कल की तरह अब भी मेरे दिल के महल में आज भी तेरा ही कोना है. मुझे बर्बाद करके भी कहीं आबाद रहते हो सुना था कल किसी से कि जिन्दाबाद रहते हो ये कैसी रहमतें दि हैं मोहब्बत के फ़साने में मैं सब कुछ भूल भी जाऊँ मगर तुम याद रहते हो.

यादों का महल

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एक एक लम्हा जोड़ कर जो यादों का महल बनाया है उसके भीतर जाकर देखूँ तो साया भी पराया है हर बात पर सोचता हूँ किसी और का मोहताज हूँ मैं आँखें मेरी हैं पर ओरों के देखता ख्वाब हूँ मैं यूँ तो ताकते हैं लोग गौर से समुंदर के नीले पानी को कोई उससे जाकर पूछे उसकी दर्दे कहानी को आज मालूम पड़ा कई समझदारों से अपने आस पास गुजरते कई बेसहारों से जिन्दगी की उथल पुथल तो हमारी ही खता है तभी तो मौत के बाद ही जन्नत में बसर मिलता है ये मत सोच “ अनुपम” कि एक तेरे यार ने ही तुझे सताया है यहाँ कईयों ने बफा के पैमाने को कभी बनाया कभी बिगाड़ा है .