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गुफ्तगू

 वो जब तुम बात करने लगती होना मुझसे     तो खिल उठता है मेरा ये मायूस चेहरा           और ये दिल दौड़ने लगता है               कल्पनाओं के घोड़ों पर              नदी पहाड़ जंगल झरने    फिर तुम जब चली जाती हो यूंही बेरुखी से तो सो जाता है दिल यथार्थ के उदास बिस्तर पर

खरगोश

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मैं चाहता हूं कि चला जाऊं एक ऐसी जगह जहां लोग न हों न हो कोई चिंता न कोई बंधन कर सकूं जहां सिर्फ चिन्तन|२ जहां हों दरख़्त विशाल प्राचीन जिनके तने को बाहों में भरकर जान सकूं अतीत उनका और कह सकूं अपनी व्यथा जहां नदियां किसी पर्वत से उतरती हों और फैल जाती हों किसी मैदान में चादर की तरह जहां रात को आसमां काला हो कि देख सकूं हर एक तारे को जहां तक भी नज़र जाती हो और महसूस कर पाऊं खुदको सुन पाऊं सांसों की आवाज और धड़कन को दौड़ते हुए मैं चाहता हूं कि चला जाऊं एक ऐसी जगह जहां धर्म न हो न हो कोई समाज न कोई रिवाज और सुन सकूं खुदकी दबी आवाज|२ मगर फिर एक खरगोश दिखता है मुझे जो कूंदता फिरता है मेरे आगे पीछे और निहारता है एक आशा भरी निगाहों से कि मेरे सीबाह उसका कोई भी न हो उसकी चंचल कलाबाजियां देख कर मेरा सूना हृदय भी उल्लास से भर जाता है उसके नादान मगर मुश्किल सवालों में मैं भूल जाता हूं संसार के सारे दुखों को उसके चेहरे की एक झलक भर से मेरे उदास जीवन में भी एक मुस्कान खिल जाती है हां वो खरगोश मेरी बेटी ही है जो मुझे जीना सिखाती है और उसके बिना अब कोई भी यात्र...

अपने उस गाँव में

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पीपल की छाँव में अपने उस गाँव में सकरी और उजड़ी पर दिलकश उन राहों में टूटे से घर में जलती दोपहर में छिपते छिपाते दिल के शहर में क्या अब भी कोई सुबह शाम से मिलती है राधा कोई क्या घनश्याम से मिलती है जमुना के कोई मुहाने की दस्तक होती है दिल के किबाड़ों पे अब तक इठलाते मौसम और मोहब्बत के किस्से कब तक अकेले सिलूँ मैं वो हिस्से तुम भी लिखो और मुझको बता दो जेठ की आंधी अब भी क्या तूफ़ान से मिलती है बड़े जतन कर सबरी क्या श्री राम से मिलती है वो मिलजुल के रहना सराफत का गहना हर एक आपदा को सदा साथ सहना वो ईद और दीवाली जो संग संग मनायीं यहाँ खीर पूरी वहाँ सेवइयां थी खायीं यहाँ मुझको वैसा न दिखता समर्पण टूटा हुआ सा अब मेरा है दर्पण वहाँ क्या अब भी गीता कभी कुरान से मिलती है सभी बंधन भूल आरती क्या अजान से मिलती है

हर तारीख पुरानी

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हर तारीख पुरानी याद जगा जाती है न भूल सका अभी एहसास दिला जाती है हर बार मेरा इतिहास मेरे आज से जीत जाता है घंटों मुझे गहराई में डूबा जाती है हर तारीख पुरानी याद जगा जाती है . जब घटा तो न था पता इतना सताएगा ये पल कि इतनी मुश्किल होगी कोई ढूँढने में हल सारे मंजर के सामने नजर थम सी जाती है उस लम्हे को अरसे बाद भी करीब पाती है हर तारीख पुरानी याद जगा जाती है . कोई अहम् बात से न है इसका वास्ता न कोई एक है हर एक इसका राश्ता ये तो हर एक घड़ी का हिसाब थमा जाती है कई आम हस्ती को खास बना जाती है हर तारीख पुरानी याद जगा जाती है . इतना अजीज न था जो मेरे अतीत में वर्तमान में वो भी है मेरे प्रतीत में जाने कब कौनसी घटना रुला जाती है मुझे अधूरे होने का फरमान सुना जाती है हर तारीख पुरानी याद जगा जाती है कल को अभी से बेहतर हर बार बता जाती है .