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गुफ्तगू

 वो जब तुम बात करने लगती होना मुझसे     तो खिल उठता है मेरा ये मायूस चेहरा           और ये दिल दौड़ने लगता है               कल्पनाओं के घोड़ों पर              नदी पहाड़ जंगल झरने    फिर तुम जब चली जाती हो यूंही बेरुखी से तो सो जाता है दिल यथार्थ के उदास बिस्तर पर

आज खामोश है सब कुछ जहाँ मे(poem about contribution)

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आज   खामोश   है    सबकुछ   जहान   में , एक   भँवर   सा   उठ    रहा   है   मेरे   ईमान   में कभी   तोहफे   में   मिली   थी   आजादी   हमें , क्या   भूल   गए   हम   खुदगर्जी    के   तूफ़ान   में . आज   मेरी    निगाहें   जहाँ   भी   पड़ती   हैं कई   आँखें   बहुत   कुछ   कहकर   टपकती   हैं कई   पेट   खाली   अभी    तक   हैं   कई   नंगे   पड़े   और   कांप   रहे   बदन   हैं कई   बचपन   बिखरते   और   उजड़ते    योवन    हैं , कई   लाचार   बुढ़ापे   और     आश   में   ढलते   जीवन   हैं   . आखिर   कब   तक   होंगे   ये   भ्रस्टाचारी   शासन कब   तक   सुन...