जो कभी लिखी थी बचपन में, वो कविता मेरा आज हुई जो कल तक थीं मेरा जीवन, वो बातें अब इतिहास हुई दुनिया की आपा धापी में, कब इतने आंगे पहुँच गये नन्ही आँखों के कुछ सपने, वो वक़्त के पंक्षी नोंच गये थोड़ा जीकर मन को मारा हर ख्वाहिश को हमने वारा मैं जीता हूँ कई जंग मगर, ये मालूम है खुदसे हारा एक रौनक थी जिनके आने से वो खुशियाँ अब उपहास हुई जो कल तक थीं मेरा जीवन, वो बातें अब इतिहास हुई जो कभी लिखी थी बचपन में, वो कविता मेरा आज हुई यहाँ वहाँ भटके उपवन में पीर उदासी के सावन में दिन में शोर हुआ आँगन में रात कटी फिर सूनेपन में कुछ उलझी सी डोरों को स्वयं ही सुलझा लेता हूँ और कुछ सीधे से रश्तों को खुद ही उलझा लेता हूँ कभी रुका मैं मंजिल से जाने कितनी मर्यादाओं में रोक लिया था कभी मुझे जब अपनों की बाधाओं ने सच छिपा अभिनय किया यह घटना ही बस खास हुई जो कल तक थीं मेरा जीवन, वो बातें अब इतिहास हुई जो कभी लिखी थी बचपन में, वो कविता मेरा आज हुई एक अरसे की बात हुई मैं स्वयं में जीता और मरता हूँ एक स्वप्न को पाने की खातिर लाख जतन मैं करता हूँ जिस डगर मैं चलत...