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गुफ्तगू

 वो जब तुम बात करने लगती होना मुझसे     तो खिल उठता है मेरा ये मायूस चेहरा           और ये दिल दौड़ने लगता है               कल्पनाओं के घोड़ों पर              नदी पहाड़ जंगल झरने    फिर तुम जब चली जाती हो यूंही बेरुखी से तो सो जाता है दिल यथार्थ के उदास बिस्तर पर

अपने उस गाँव में

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पीपल की छाँव में अपने उस गाँव में सकरी और उजड़ी पर दिलकश उन राहों में टूटे से घर में जलती दोपहर में छिपते छिपाते दिल के शहर में क्या अब भी कोई सुबह शाम से मिलती है राधा कोई क्या घनश्याम से मिलती है जमुना के कोई मुहाने की दस्तक होती है दिल के किबाड़ों पे अब तक इठलाते मौसम और मोहब्बत के किस्से कब तक अकेले सिलूँ मैं वो हिस्से तुम भी लिखो और मुझको बता दो जेठ की आंधी अब भी क्या तूफ़ान से मिलती है बड़े जतन कर सबरी क्या श्री राम से मिलती है वो मिलजुल के रहना सराफत का गहना हर एक आपदा को सदा साथ सहना वो ईद और दीवाली जो संग संग मनायीं यहाँ खीर पूरी वहाँ सेवइयां थी खायीं यहाँ मुझको वैसा न दिखता समर्पण टूटा हुआ सा अब मेरा है दर्पण वहाँ क्या अब भी गीता कभी कुरान से मिलती है सभी बंधन भूल आरती क्या अजान से मिलती है

जो कभी लिखी थी बचपन में(A Poem About broken Desires)

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जो कभी लिखी थी बचपन में, वो कविता मेरा आज हुई जो कल तक थीं मेरा जीवन, वो बातें अब इतिहास हुई दुनिया की आपा धापी में, कब इतने आंगे पहुँच गये नन्ही आँखों के कुछ सपने, वो वक़्त के पंक्षी नोंच गये थोड़ा जीकर मन को मारा हर ख्वाहिश को हमने वारा मैं जीता हूँ कई जंग मगर, ये मालूम है खुदसे हारा एक रौनक थी जिनके आने से वो खुशियाँ अब उपहास हुई जो कल तक थीं मेरा जीवन, वो बातें अब इतिहास हुई जो कभी लिखी थी बचपन में, वो कविता मेरा आज हुई यहाँ वहाँ भटके उपवन में पीर उदासी के सावन में दिन में शोर हुआ आँगन में रात कटी फिर सूनेपन में कुछ उलझी सी डोरों को स्वयं ही सुलझा लेता हूँ और कुछ सीधे से रश्तों को खुद ही उलझा लेता हूँ कभी रुका मैं मंजिल से जाने कितनी मर्यादाओं में रोक लिया था कभी मुझे जब अपनों की बाधाओं ने सच छिपा अभिनय किया यह घटना ही बस खास हुई जो कल तक थीं मेरा जीवन, वो बातें अब इतिहास हुई जो कभी लिखी थी बचपन में, वो कविता मेरा आज हुई एक अरसे की बात हुई मैं स्वयं में जीता और मरता हूँ एक स्वप्न को पाने की खातिर लाख जतन मैं करता हूँ जिस डगर मैं चलत...